वो नदी थी, वापस मुड़ी नहीं,
और मैं पहाड़ था, आगे बढ़ा नहीं।
वो सब कुछ समेट कर ले गई,
और मैं अपनी जगह से हिला नहीं।
वो अपने रास्ते में बहती रही,
मैं अपनी जगह खड़ा रहा।
उसे सफ़र की जल्दी थी,
मुझे उसे रोकने की उम्मीद...
वो हर मोड़ पर मुझसे दूर होती गई,
और मैं हर मोड़ पर उसे देखता रहा।
कुछ रिश्ते भी पहाड़ और नदी जैसे होते हैं,
कभी-कभी मैं लिख लेता हूं दिल के तारछेड़ लेता हूं जिंदगी यूं ही कट जाएगी इसलिए मैं कभी-कभीलख लेता हूं दिल की तमन्ना कागज पर लिख लेता हूं।
Beautiful..
ReplyDeleteI truly admire people who are open about their feelings and you have expressed yours with a wonderful, poetic touch.
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