Thursday, October 22, 2026

रिश्तो के सारांश

वो नदी थी, वापस मुड़ी नहीं,
और मैं पहाड़ था, आगे बढ़ा नहीं।
वो सब कुछ समेट कर ले गई,
और मैं अपनी जगह से हिला नहीं।
वो अपने रास्ते में बहती रही,
मैं अपनी जगह खड़ा रहा।
उसे सफ़र की जल्दी थी,
मुझे उसे रोकने की उम्मीद...
वो हर मोड़ पर मुझसे दूर होती गई,
और मैं हर मोड़ पर उसे देखता रहा।
कुछ रिश्ते भी पहाड़ और नदी जैसे होते हैं,
एक ठहर जाता है... दूसरा बहता चला जाता है।
 कभी-कभी मैं लिख लेता हूं दिल के तारछेड़ लेता हूं जिंदगी यूं ही कट जाएगी इसलिए मैं कभी-कभीलख लेता हूं दिल की तमन्ना कागज पर लिख लेता हूं।