यहाँ हर शख़्स की अपनी अलग ज़ुदा सी राहें हैं।
नज़र में भीड़ है, पर रूह में एक ख़ालीपन सा है,
ये शहर ज़िंदा है, मगर हर मोड़ पर तन्हाई का साया है।
मैं गुज़रता था इसी रफ़्तार के दरिया के किनारे से,
जहाँ हर हाथ को बस थमने के झूठे सहारे थे।
तभी किस्मत ने रुक कर मुड़ते हुए मुझसे ये पूछा था,
"अकेले चलते-चलते क्या कभी तूने खुद को देखा था?"
"हज़ारों साथ हैं तेरे, फिर भी तू तन्हा ही चलता है?
ये कैसी ज़िद है तेरी, जो तू साँचे में नहीं ढलता है?
कोई क्यूँ थाम ले ये हाथ, जो दुनिया से कतराए,
तू वो चिराग है, जो खुद अपनी ही लौ से घबराए।"
सुनी जब बात किस्मत की, तो लबों पर एक हँसी आई,
वो हँसी—जिसमें दुनिया की हर एक रुसवाई समाई थी।
कहा मैंने, "ये जो दुनिया के ये दस्तूर, ये मेले हैं,
दीवानों के लिए तो ये तमाशे ही अकेले हैं।"
"दीवानों का ये हाथ, हर कोई थाम नहीं सकता,
जो खुद में खोया हो, उसे कोई नाम नहीं दे सकता।"
ज़माने की ये रस्में, ये पकड़, ये रब्त कमज़ोर हैं,
मेरी तन्हाई का आलम, इन शोरों से कहीं और है।
Kavi ne aapni inn panktiyon mein aapni ncr ki bhadas nikali hain
ReplyDeleteवाह! क्या बात है। खुद ही सवाल की रुपरेखा और उसका हल है।
ReplyDeleteVery well written, it shows all your emotions beautifully
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