बड़े होने का सच बहुत कड़वा है, बहुत अकेला है ये बसेरा।
छूट गए वो चीड़ के जंगल, और वो सीढ़ीनुमा अपने खेत,
एक पहाड़ी की किस्मत में शायद, लिखी है बस परदेस की रेत।
त्यौहारों पर भी जब घर का आँगन, दूर से सूना नज़र आता है,
बन्द कमरे में ये मन, अपने पहाड़ को याद कर अश्क बहाता है।
माँ के हाथों की वो गर्माहट, बाबुजी की वो फिक्र याद आती है,
ये रोज़ी-रोटी की मजबूरी भी, हमें कैसे-कैसे दिन दिखाती है।
पर इस उदासी के अँधेरे में भी, मैंने एक उम्मीद की लौ जला रखी है,
गाँव की ढलान पर, अपने हिस्से की वो थोड़ी सी ज़मीन बचा रखी है।
भले ही बहुत छोटा सा है वो टुकड़ा, पर उसमें मेरी पूरी जान बसती है,
उसी माटी के ख्यालों में छुपकर, मेरी एक नई दुनिया हँसती है।
एक दिन लौटूँगा ये शहर छोड़कर, ये मेरा आज खुद से वादा है,
उसी ज़मीन पर अपना घर बनाना, अब ज़िन्दगी का इकलौता इरादा है।
पत्थर और लकड़ी का वो छोटा सा मकान, जहाँ फिर से चूल्हा जलेगा,
ज़िन्दगी की ढलती शाम में, मेरे पहाड़ पर मेरा अपना सवेरा खिलेगा।

Reminds of my mother's dream which was fulfilled... To have a little house in the hills... But in very old age it isn't practical to stay there because medical facilities are not close by and marketing also is difficult. Kahin dur jab din dhal jaye..... You have a way with words... Beautifully written
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